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हमारा ‘स्वयं’ यानी हम जो हैं, वह बहुत सारी चीज़ों से मिलकर बना होता है। इसमें हमारा शरीर, हमारा मन, हमारी सोच, हमारी भावनाएँ और हमारे अनुभव शामिल होते हैं।
डिजिटल रिश्तों में एसेक्सुअल लोगों को सबसे ज़्यादा संघर्ष अपनी सीमाओं को लेकर करना पड़ता है। “मुझे इसमें दिलचस्पी नहीं है” या “मैं ऐसा नहीं चाहता” जैसे वाक्य कई बार सामने वाले को अपमान या रिजेक्शन जैसे लग सकते हैं।
ऐसे परिवेश में आत्मीयता ही निगरानी की संरचना बन जाती है।
यडिजिटल हिंसा सिर्फ़ टेक्नोलॉजी की समस्या नहीं है। यह समाज में पहले से मौजूद असमानताओं का ही विस्तार है।
डिजिटल स्पेस ने क्वीयर और ट्रांस समुदाय को वह दिया है, जो अक्सर घर, स्कूल और समाज नहीं दे पाए। देखे जाने का हक़, बोले जाने की जगह और चुने हुए रिश्ते।
भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, यह पहचान, संबंध और संघर्ष का भी ज़रिया है। भाषा सामाजिक संरचना, पहचान और सत्ता-संबंधों को दर्शाने का भी औज़ार है।
डिजिटल मीडिया ने भारत में CSE को नई दिशा दी है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब चैनल और आधुनिक कहानी-आधारित सामग्री ने न केवल जानकारी का लोकतंत्रीकरण किया है बल्कि युवाओं में आत्मविश्वास, समझ और संवेदनशीलता भी बढ़ाई है।
सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि समावेशी दोस्ती समाज में भी बदलाव लाती है। जब दोस्त एक-दूसरे को बिना भेदभाव अपनाते हैं, तो यह उदाहरण बनता है और धीरे-धीरे एक ऐसी संस्कृति का निर्माण होता है जहाँ विविधता को सम्मान और स्वीकार्यता मिलती है।
कुछ साल पहले ही मुझे एहसास हुआ कि जब भी मैं भविष्य के बारे में सोचती हूँ, तो मेरे मन में हमेशा अपनी सबसे करीबी महिला मित्रों की तस्वीर उभरती है। मेरे हर फ़ैसले पर सबसे ज़्यादा असर उन्हीं का पड़ता है…
जबकि सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भारत में क्वीयर लोगों को जुड़ने, ख़ुद को अभिव्यक्त करने और गैर-अपराधीकरण के बाद समुदाय ख़ोजने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं, संबद्धता के विचार अभी भी जाति, वर्ग, सौंदर्यशास्त्र आदि में उलझे हुए हैं जो बहिष्कार को कायम रखते हैं।
जलवायु परिवर्तन का नाम सुनते ही हमारे मन में केवल पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का विचार आता है, लेकिन इसका ग़हरा संबंध हमारी मानसिक सेहत और यौनिकता से भी है
जलवायु न्याय की बात करना इस बारे में बात करना है कि कौन सुरक्षित महसूस करेंगे, कौन चुनने का अधिकार पाएंगे, कौन चाहने का अधिकार पाएंगे
सेक्स वर्क को जलवायु परिवर्तन के नज़रिए से कम ही देखा जाता है, लेकिन इस संबंध को समझना ज़रूरी है
हमने सालों में जो हुनर, रिश्तों के जाल और टिके रहने की ताक़त बनाई है, वो सिर्फ़ हाशिए की कहानियाँ नहीं हैं – वो ऐसे औज़ार हैं जिनसे पूरी व्यवस्था सीख सकती है।